पुणे में गंदे और टेप लगे नोटों पर काउंटरों पर झगड़े, व्यापारियों ने आरबीआई से मांगे नए नोट
10, 20 और 50 रुपये के फटे-पुराने नोटों को लेकर दुकानों, पेट्रोल पंपों और बस में बहस बढ़ रही है। व्यापार विकास मंडल ने आरबीआई को ज्ञापन दिया है।
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पुणे में 10, 20 और 50 रुपये के गंदे नोटों को लेकर लोगों का पारा चढ़ रहा है। दुकानों, मॉल और पेट्रोल पंपों पर तो बहस हो ही रही है, सफर करने वालों और सार्वजनिक परिवहन चलाने वालों के बीच भी तकरार हो रही है। महाराष्ट्र राज्य के व्यापार विकास मंडल (VVM) का मुख्यालय पुणे में है। मंडल ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को बाकायदा ज्ञापन देकर मांग की है कि बाजार में नए नोट उतारे जाएं और सड़े-गले नोट चलन से हटाए जाएं।
छोटे मूल्य के नए नोट अब मिलते ही नहीं। जो नोट चल रहे हैं, वे हजारों हाथों से गुजर चुके हैं और चिकट, घिसे हुए टुकड़ों जैसे हो गए हैं। कोई नहीं चाहता कि ऐसा "न चलने वाला" नोट उसके हाथ में रह जाए। महाराष्ट्र के बाकी शहरों में भी हाल कुछ अलग नहीं है, और गांवों में कैशलेस लेन-देन तो और भी कम होता है।
यूपीआई और डिजिटल स्कैनर के बावजूद नकद पैसा अब भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। राज्य भर में ठेलों, किराना काउंटरों और टिकट खिड़कियों पर गंदे, फटे और कई जगह टेप से जोड़े गए नोट भरे पड़े हैं। रोज की छोटी खरीदारी भी तीखी बहस में बदल जा रही है।
पुणे की थोक मंडी में सीसीटीवी कैमरे और निगरानी उपकरणों की दुकान चलाने वाले और VVM के सदस्य मनोज शिंदे ने बताया कि खुले पैसे की तलाश से उनका धंधा रोज प्रभावित होता है। उन्होंने कहा, "हर सुबह मुड़े-तुड़े 10 रुपये के नोट पर बहस से शुरू होती है। ग्राहक गंदे 10 या 20 रुपये के नोट लेने से साफ मना कर देते हैं और कहते हैं कि हम कचरा थमा रहे हैं। लेकिन खुद पैसे देते वक्त तीन परत सेलो टेप से चिपके नोट पकड़ा देते हैं। कल ही टेप लगे 50 रुपये के नोट पर बुरी तरह झगड़ने के बाद एक ग्राहक दूध और सब्जी का पूरा थैला छोड़कर चला गया। हम दुकानदार हैं, नोट जांचने वाले विशेषज्ञ नहीं। हमारे दिन का आधा वक्त नोट की हालत पर फैसला करने में चला जाता है।"
पेशे से नौकरीपेशा अल्ताफ शेख ने बताया कि हाल ही में वानवडी की एक मशहूर मिठाई की दुकान पर उनकी काउंटर पर बैठे कर्मचारी से बहस हो गई। उनके मुताबिक कर्मचारी ने उनका दिया नोट यह कहकर लेने से मना कर दिया कि ग्राहक "खराब" नोट नहीं लेते।
स्टेशनरी की दुकान चलाने वाले दिनेश चौधरी का कहना है कि यह किल्लत पूरी सप्लाई चेन में फैल जाती है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक परिवहन, शेयर ऑटो और माल ढोने वाले टेम्पो पूरी तरह नकद पर चलते हैं। कंडक्टर और ड्राइवर गंदे 10 और 20 रुपये के नोट नहीं लेते, तो यात्री विरोध करते हैं, ट्रैफिक रुकता है और फेरे लेट होते हैं। ड्राइवर डिपो में ठुकराए हुए, भुरभुरे नोटों की गड्डियां लेकर लौटते हैं, जिन्हें स्थानीय पेट्रोल पंप भी नहीं लेते। चौधरी बोले, "जब जेब का बुनियादी कानूनी नोट रद्दी कागज की तरह देखा जाए, तो हम ट्रांसपोर्ट नहीं चला सकते।"
रास्ता पेठ के वरिष्ठ नागरिक कुणाल सोनावणे ने सवाल किया, "क्या सरकार कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए जानबूझकर नोट नहीं छाप रही?"
सबसे ज्यादा मार अर्ध-शहरी और ग्रामीण इलाकों पर पड़ी है, जहां डिजिटल नेटवर्क कमजोर है, बिना बैंक खाते वाले मजदूर हैं और दिहाड़ी नकद में मिलती है। VVM के ज्ञापन में कहा गया है कि स्थानीय बैंक शाखाएं व्यापारियों को साफ छोटे नोट नहीं दे रहीं और गंदे नोट बदलवाने आने वालों को भी लौटा रही हैं।
VVM के अध्यक्ष कमलेश दिलीप मुथा ने कहा कि बैंकिंग व्यवस्था छोटे कारोबारियों को नुकसान पहुंचा रही है। उनके शब्दों में, "खुदरा और छोटे स्तर के कारोबार की जान नकद ही है। छोटे नोट गायब हो रहे हैं या बेकार चीथड़े बन रहे हैं, और इस तरह बैंकिंग तंत्र छोटे धंधों का दम घोंट रहा है। हमने आरबीआई से फौरन दखल देने की मांग करते हुए औपचारिक ज्ञापन दिया है।"
मंडल की मांग है कि आरबीआई ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में सरकारी बैंकों की शाखाओं, सहकारी बैंकों और एटीएम तक 10, 20 और 50 रुपये के कड़क नोटों की सप्लाई बिना रुकावट पक्की करे। साथ ही व्यावसायिक बैंकों को सख्ती से कहा जाए कि वे ग्राहकों को लौटाए बिना खराब नोट लें और उन्हें चलन से हटाएं। व्यापारिक संगठनों का कहना है कि जब तक आरबीआई सुस्त बैंक शाखाओं पर कार्रवाई नहीं करता और नए, साफ नोट नहीं उतारता, काउंटरों पर यह रोज की खींचतान बढ़ती ही जाएगी।
आरबीआई के एक अधिकारी ने कहा कि केंद्रीय बैंक ये नोट किसी तय तारीख पर नहीं छापता। उन्होंने बताया, "छपाई का फैसला करेंसी प्रेसों को दिए जाने वाले सालाना इंडेंट से होता है, जो आर्थिक वृद्धि, महंगाई, जीडीपी अनुमान और नकद की मांग पर टिके होते हैं। जनता की मांग पर जरूर गौर किया जाएगा और अथॉरिटी उसी हिसाब से कदम उठाएगी।"
अधिकारी के मुताबिक आरबीआई के नियम कहते हैं कि जनता के हाथ में खराब पैसा नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा, "जो नोट गंदे हो गए हैं, ढीले पड़ गए हैं या दो टुकड़ों में बंट गए हैं, बशर्ते कटान सीरियल नंबर वाले हिस्सों से न गुजरे, उन्हें सॉइल्ड नोट माना जाता है।" ऐसे नोट किसी भी सरकारी बैंक शाखा, निजी बैंक के करेंसी चेस्ट या आरबीआई इश्यू ऑफिस में काउंटर पर ही बदले जाने चाहिए, बिना किसी फॉर्म या अर्जी के।
जिन नोटों के टुकड़े गायब हैं, अशोक चिन्ह या हस्ताक्षर जैसी अहम सुरक्षा निशानियों पर फटे हैं या जो बुरी तरह खराब हैं, उन्हें आरबीआई के नोट रिफंड नियमों के तहत बदला जा सकता है। अधिकारी ने आरबीआई की नियम पुस्तिका का हवाला देते हुए कहा, "बुरी तरह जले या भुरभुरे नोट सीधे आरबीआई इश्यू ऑफिस में दिए जा सकते हैं या ट्रिपल लॉक रिसेप्टेकल (TLR) ड्रॉप-बॉक्स के जरिए जमा किए जा सकते हैं।"
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