पुणे कोर्ट में 10 मिनट हंगामा, छह लोगों पर 1,000-1,000 रुपये का जुर्माना
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अदालत की कार्यवाही में रुकावट डालने पर मजिस्ट्रेट ने छह लोगों को जुर्माना ठोका, तीन को तुरंत न्यायिक हिरासत में भेजने का भी आदेश दिया।
इंसाफ मांगने कोर्ट पहुंचे लोग खुद सजा के हकदार बन गए। पुणे की एक अदालत में दो पक्षों के बीच ऐसा हंगामा हुआ कि करीब 10 मिनट तक कामकाज ठप रहा। इस पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए छह लोगों पर 1,000-1,000 रुपये का जुर्माना लगाया और साफ कहा कि अदालत निजी झगड़े निपटाने की जगह नहीं है।
जिन छह लोगों पर जुर्माना लगा, उनके नाम प्रसाद पवार, नामदेव पवार, शांता पवार, सविता चव्हाण, लहू चव्हाण और प्रांजल चव्हाण बताए गए हैं। यह आदेश न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी डॉ. जी. आर. दोर्नालापल्ले ने दिया।
मामला समर्थ पुलिस स्टेशन में दर्ज एक आपराधिक केस की सुनवाई के दौरान का है। सुनवाई के वक्त शिकायतकर्ता और आरोपी, दोनों पक्ष कोर्ट में मौजूद थे। कार्यवाही के बीच ही दोनों में कहा-सुनी शुरू हो गई। ऐसा लगा कि कोर्ट के बाहर का झगड़ा फिर अंदर चला आया है। वकीलों की मौजूदगी में देखते ही देखते शोर-शराबा बढ़ गया।
इस टकराव की वजह से करीब 10 मिनट तक अदालत का कामकाज रुका रहा और कार्यवाही एक जगह थम गई।
कड़ी सजा से बचने के लिए इनमें से कुछ लोगों ने माफी मांगी और नरमी बरतने की गुजारिश की। लेकिन माफी का उन्हें कोई फायदा नहीं मिला। अभियोजन पक्ष ने किसी भी तरह की रियायत का जोरदार विरोध किया। उसकी दलील थी कि न्यायिक कार्यवाही में अड़ंगा डालना और कोर्ट का अनादर करना गंभीर अपराध हैं, जिन्हें हल्के में नहीं लिया जा सकता।
अभियोजन की तरफ से सरकारी वकील योगेश कदम पेश हुए। उन्होंने कोर्ट से मांग की कि इस घटना को सख्ती से लिया जाए।
कार्यवाही में पड़ी रुकावट और अभियोजन की दलीलों को ध्यान में रखते हुए मजिस्ट्रेट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 384 का इस्तेमाल किया। उन्होंने छहों लोगों में से हर एक पर 1,000 रुपये का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि जुर्माना नहीं भरा गया तो एक महीने की साधारण कैद भुगतनी होगी।
इसके अलावा कोर्ट ने निर्देश दिया कि इनमें से तीन लोगों को फौरन न्यायिक हिरासत में ले लिया जाए।
अदालत की इस कार्रवाई से संदेश साफ है कि कोर्ट इंसाफ देने के लिए है, पुराना हिसाब चुकता करने के लिए नहीं। कार्यवाही में खलल डालने के बाद माफी मांग लेने भर से उसके नतीजे अपने आप खत्म नहीं हो जाते।
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