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पुणे के पेड़ बचाने वाले कार्यकर्ता विनोद जैन 16 साल बाद PMC दफ्तर वाले केस में बरी

पुणे के पेड़ बचाने वाले कार्यकर्ता विनोद जैन 16 साल बाद PMC दफ्तर वाले केस में बरी तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
जुर्म PT24 टीम

पुणे की अदालत ने 2018 की सज़ा रद्द कर पेड़ कटाई के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले विनोद रायचंद जैन को सभी आरोपों से बरी किया।

पुणे में अवैध पेड़ कटाई के खिलाफ याचिकाएं और RTI अर्ज़ियां लगाने वाले कार्यकर्ता विनोद रायचंद जैन को आखिरकार अदालत से राहत मिल गई है। पुणे की एक अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया है। इसी के साथ 2018 में उन्हें सुनाई गई सज़ा भी रद्द हो गई। आरोप था कि 2010 में पुणे महानगरपालिका (PMC) के दफ्तर में उन्होंने पेपरवेट फेंका और अधिकारियों को धमकाया। इस केस को लड़ते हुए जैन के 16 साल निकल गए।

अपील की सुनवाई अतिरिक्त सेशन्स जज मोरेश्वर एस. कुलकर्णी ने की। मामला फरवरी 2010 में PMC के उद्यान विभाग में हुई एक घटना से शुरू हुआ था, जिसके बारे में विवाद रहा। जैन का कहना है कि यह केस पेड़ कटाई पर सवाल उठाने वाले कार्यकर्ता की आवाज़ दबाने के लिए जानबूझकर खड़ा किया गया था।

केस की शुरुआत 17 फरवरी 2010 को हुई, जब डेक्कन पुलिस स्टेशन में FIR दर्ज की गई। शिकायत उस वक्त के PMC उद्यान अधीक्षक अशोक घोरपड़े ने की थी। अभियोजन पक्ष के मुताबिक जैन और सह-आरोपी दीपक वहीकर संभाजी पार्क स्थित उद्यान विभाग के दफ्तर में घुस गए थे।

अधिकारियों का आरोप था कि जैन ने बॉम्बे हाई कोर्ट के रोक आदेश के बावजूद पेड़ काटने की दी गई इजाज़त पर विभाग से तीखे सवाल किए। अभियोजन का दावा था कि उन्होंने पेपरवेट फेंका, जिससे कांच का दरवाज़ा टूट गया और दफ्तर में रखी ट्रॉफियां क्षतिग्रस्त हुईं। यह भी आरोप था कि उन्होंने ड्यूटी पर मौजूद अधिकारियों को धमकाया।

भारतीय दंड संहिता की धारा 353 (सरकारी कर्मचारी को रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल) और धारा 506 (आपराधिक धमकी) के साथ सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 की धारा 3 के तहत आरोप तय हुए। जनवरी 2018 में जुडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (JMFC) की अदालत ने जैन को दोषी ठहराकर छह महीने की सश्रम कैद सुनाई। उन्होंने इस फैसले को क्रिमिनल अपील नंबर 80/2018 में चुनौती दी।

जैन की तरफ से वकील मनीष देसाई और हर्षद मांडके ने अदालत में कहा कि अभियोजन का केस खामियों और आपसी विरोधाभासों से भरा है। एक अहम मोड़ तब आया जब FIR की दो छपी कॉपियां (Exh. 30 और Exh. 75) पेश की गईं। बचाव पक्ष ने बताया कि अभियोजन शिकायत 17 फरवरी 2010 को दर्ज होने की बात कहता है, लेकिन छपी FIR में हाथ से ओवरराइटिंग थी, जिससे तारीख 18 फरवरी से बदलकर 17 फरवरी की गई लगती है।

बचाव पक्ष के मुताबिक दूसरी छपी FIR से पता चलता है कि दस्तावेज़ 18 फरवरी की रात ही भरा गया, यानी कथित घटना के 24 घंटे से ज़्यादा बाद। उसमें 'paper' के बाद 'weight' शब्द भी हाथ से जोड़ा गया था। बचाव का तर्क था कि पेपरवेट फेंके जाने की कहानी गढ़ने के लिए ऐसा किया गया।

बचाव पक्ष ने अभियोजन के गवाहों के बयानों में घटनास्थल को लेकर फर्क भी गिनाया। मुख्य शिकायतकर्ता ने कहा कि उसके केबिन में तोड़फोड़ हुई, मगर जिरह में माना कि 8x8 फुट के उस छोटे केबिन में कोई शोकेस या ट्रॉफी थी ही नहीं। एक और अहम सरकारी गवाह ने गवाही दी कि घटना बिलकुल दूसरे केबिन में हुई। FIR में जिन वरिष्ठ अधिकारी का नाम था, उन्होंने उस दिन दफ्तर में होने से ही इनकार किया।

बचाव ने यह भी कहा कि जब्त माल रिकॉर्ड से मेल नहीं खाता। ट्रायल कोर्ट में पेश सामान सफेद लिफाफे में था, जबकि मौका पंचनामे में दर्ज था कि टूटा कांच और पेपरवेट भूरे कागज़ में सील किए गए थे।

फैसला सुनाते हुए जज कुलकर्णी ने कहा कि अभियोजन आपराधिक बल, धमकी या संपत्ति के नुकसान को साबित करने के लिए ठोस और निर्णायक सबूत पेश नहीं कर सका। अदालत ने जैन के सामाजिक काम का भी ज़िक्र किया, जिसमें अवैध पेड़ कटाई के खिलाफ जनहित याचिकाएं और सूचना का अधिकार (RTI) कानून का इस्तेमाल शामिल है। इसी वजह से उनका नागरिक प्रशासन से टकराव होता रहा था।

अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 248(1) के तहत जैन को सभी आरोपों से बरी किया, उनके जमानत बांड रद्द किए और अगर कोई जुर्माना भरा गया हो तो उसे लौटाने का निर्देश दिया।

फैसले पर जैन ने कहा, "आखिरकार सच की जीत हुई, हालांकि इसमें 16 लंबे साल की कानूनी लड़ाई लगी। यह केस कभी दफ्तर में कथित हंगामे का था ही नहीं। यह नगर निगम के अधिकारियों की जानबूझकर की गई कोशिश थी कि अवैध पेड़ कटाई उजागर करने वाले और नगर प्रशासन के खिलाफ RTI लगाने वाले कार्यकर्ताओं की आवाज़ दबाई जाए।"

जैन ने आगे कहा, "करीब दो दशक तक आपराधिक आरोप के साए में जीना थका देने वाला था, लेकिन यह फैसला हमारे रुख को सही ठहराता है कि पर्यावरण के लिए शांतिपूर्वक आवाज़ उठाने को गढ़े हुए पुलिस केस दर्ज करके दबाया नहीं जा सकता।"

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