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नवी मुंबई के टेरना मेडिकल कॉलेज पर एमबीबीएस इंटर्न को 18,000 रुपये स्टाइपेंड न देने का आरोप

नवी मुंबई के टेरना मेडिकल कॉलेज में पात्र एमबीबीएस इंटर्न को तय स्टाइपेंड न मिलने के आरोप ने सवाल खड़े किए हैं। कॉलेज के डीन की ओर से कोई जवाब नहीं आया है।

नवी मुंबई के टेरना मेडिकल कॉलेज पर एमबीबीएस इंटर्न को 18,000 रुपये स्टाइपेंड न देने का आरोप तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

नवी मुंबई के टेरना मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस इंटर्न को उनका स्टाइपेंड न मिलने का आरोप सामने आया है। आरोप है कि पात्र इंटर्न को हर महीने 18,000 रुपये का जो स्टाइपेंड मिलना चाहिए, वह उन्हें नहीं दिया जा रहा। इससे महाराष्ट्र के तय नियमों के पालन और प्राइवेट मेडिकल संस्थानों की जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं।

एमबीबीएस की पढ़ाई के बाद हर मेडिकल स्टूडेंट को एक साल की इंटर्नशिप करनी पड़ती है। यह इंटर्नशिप जरूरी होती है और इसमें इंटर्न को ट्रेनिंग के तौर पर क्लिनिकल ड्यूटी करनी होती है। निगरानी में काम करते हुए वे अपनी डिग्री की शर्तें पूरी करते हैं। स्टाइपेंड का ढांचा इसीलिए बना है कि पात्र इंटर्न को सक्षम अथॉरिटी का तय किया हुआ पैसा मिले।

महाराष्ट्र के चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान निदेशालय (DMER) ने 10 जुलाई 2024 को एक सर्कुलर जारी किया था। उसमें राज्य के प्राइवेट मेडिकल कॉलेजों से कहा गया कि वे पात्र एमबीबीएस इंटर्न को हर महीने 18,000 रुपये स्टाइपेंड दें। सर्कुलर में नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के लागू नियमों और महाराष्ट्र सरकार के 27 फरवरी 2024 के प्रस्ताव का हवाला दिया गया था।

NMC के कंपल्सरी रोटेटिंग मेडिकल इंटर्नशिप रेगुलेशंस, 2021 के मुताबिक इंटर्न को वह स्टाइपेंड मिलना चाहिए जो संस्थान, यूनिवर्सिटी या राज्य पर लागू फीस तय करने वाली अथॉरिटी ने तय किया हो। महाराष्ट्र सरकार ने फरवरी 2024 में सरकारी मेडिकल कॉलेजों के इंटर्न का मासिक स्टाइपेंड 11,000 रुपये से बढ़ाकर 18,000 रुपये किया। उसके बाद DMER ने जुलाई के सर्कुलर से यही 18,000 रुपये की शर्त प्राइवेट कॉलेजों पर भी लागू की। सर्कुलर में कॉलेजों से यह भी कहा गया कि वे जो स्टाइपेंड दे रहे हैं, उसका ब्योरा जमा करें। इससे अथॉरिटी के पास यह जांचने का आधार है कि संस्थान नियम मान रहे हैं या नहीं।

टेरना के मामले में असली सवाल यह है कि कॉलेज अपने पात्र इंटर्न को लागू स्टाइपेंड दे रहा है या नहीं। कितना स्टाइपेंड रोका गया, यह तय करने के लिए स्टूडेंट्स के पेमेंट रिकॉर्ड, इंटर्नशिप का ब्योरा और कॉलेज का आधिकारिक जवाब जरूरी है।

रकम की बात करें तो अगर बताई गई 100 स्टूडेंट्स की बैच पूरी तरह पात्र इंटर्न की है, तो आंकड़ा बड़ा बनता है। 18,000 रुपये प्रति इंटर्न के हिसाब से एक महीने का कुल खर्च 18 लाख रुपये होगा। 12 महीनों में सालाना देनदारी 2.16 करोड़ रुपये बैठती है। यह हिसाब बताई गई बैच साइज और मासिक दर पर टिका है। यह इस बात का सबूत नहीं है कि कॉलेज ने 2.16 करोड़ रुपये रोके या कहीं और लगाए। टेरना के स्टूडेंट्स से बात हुई तो उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि इंटर्नशिप के लिए पात्र कुल 100 स्टूडेंट्स हैं।

मामला सिर्फ रकम का नहीं है। सवाल यह भी है कि लागू नियमों का पालन हो रहा है या नहीं, और जरूरी क्लिनिकल ट्रेनिंग पूरी कर रहे स्टूडेंट्स को उनका हक का स्टाइपेंड मिल रहा है या नहीं।

टीम ने टेरना मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. सुनील पेटकर से संपर्क करने की कोशिश की, ताकि कॉलेज का पक्ष जाना जा सके। 48 घंटे से ज्यादा वक्त तक बार-बार कॉल और मैसेज किए गए, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। टीम ने चिकित्सा शिक्षा मंत्री और NCP नेता हसन मुश्रीफ से भी उनकी टिप्पणी मांगी। उनके प्रवक्ता ने कहा कि मंत्री इस मामले को संज्ञान में लेंगे, खुद देखेंगे और इसकी जांच करवाएंगे।

कॉलेज का जवाब अभी आना बाकी है। कथित तौर पर स्टाइपेंड न देने की कोई वजह कॉलेज ने नहीं बताई है, और अगर कोई वजह है तो वह साफ नहीं है।

अब सवाल कार्रवाई का भी है। अथॉरिटी को पहले इंटर्न की पात्रता, पेमेंट रिकॉर्ड और मिली शिकायतों को देखना होगा, तभी तय होगा कि टेरना ने नियम तोड़े या नहीं। अगर उल्लंघन साबित होता है, तो संबंधित अथॉरिटी मेडिकल शिक्षा और स्टाइपेंड भुगतान से जुड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई पर विचार कर सकती हैं। स्टूडेंट्स के लिए यह आर्थिक मदद का भी मामला है और जरूरी इंटर्नशिप के नियम लागू होने का भी। कॉलेज अपनी स्टाइपेंड नीति और पेमेंट रिकॉर्ड साफ-साफ बताए, तो उठे सवालों का जवाब मिल सकता है।

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