मुलुंड से परेल तक ग्रीन कॉरिडोर, 25 मिनट में पहुंचा दिल, 17 साल के लड़के को मिली नई जिंदगी
वाडिया अस्पताल ने 6 अक्टूबर को अपना पहला हार्ट ट्रांसप्लांट किया। डोनर दिल मुलुंड से परेल 25 मिनट में पहुंचा।
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मुंबई के मुलुंड और परेल के बीच करीब 24 किलोमीटर की दूरी है। 6 अक्टूबर को एक डोनर दिल ग्रीन कॉरिडोर के जरिए यह 23.9 किलोमीटर का फासला सिर्फ 25 मिनट में तय करके मुलुंड से परेल पहुंचा। ग्रीन कॉरिडोर एक खास तौर पर तय किया गया, ट्रैफिक से खाली रास्ता होता है। इसमें इमरजेंसी गाड़ी डोनर अस्पताल से निकाला गया अंग बिना कहीं रुके रिसीवर के अस्पताल तक ले जाती है।
यह दिल परेल के बाई जेरबाई वाडिया हॉस्पिटल फॉर चिल्ड्रन पहुंचा। इसी अस्पताल ने 6 अक्टूबर को अपना पहला हार्ट ट्रांसप्लांट किया। मरीज एक किशोर था, जिसे डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी और गंभीर हार्ट फेल्योर था।
ऑपरेशन बाल हृदय सर्जन डॉ. बिस्वा पांडा की टीम ने किया। मरीज 17 साल का तन्मय शिंदे है, जो नवी मुंबई के घणसोली का रहने वाला है। पिछले साल के आखिर में कई अस्पतालों में दिखाने के बाद उसकी हालत बिगड़ती गई। 15 दिसंबर 2025 को उसे गंभीर हालत में आगे की जांच और खास हार्ट इलाज के लिए वाडिया अस्पताल लाया गया।
डॉ. पांडा ने बताया, "तन्मय को डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी निकली। इसमें दिल की मांसपेशी बड़ी और कमजोर हो जाती है, जिससे वह खून ठीक से पंप नहीं कर पाता और हार्ट फेल्योर हो जाता है। गहन इलाज और दवाओं से उसके दिल का काम कुछ समय के लिए सुधरा और उसे इस साल 28 जनवरी को छुट्टी मिल गई।" लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। घर लौटने के बाद भी तन्मय कमजोर बना रहा और इलाज व जांच के लिए उसे बार-बार अस्पताल आना पड़ा, कई बार भर्ती भी होना पड़ा।
दिल का काम बहुत ज्यादा खराब रहने से ट्रांसप्लांट की सलाह दी गई। जोनल ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन सेंटर (ZTCC) के जरिए उसका नाम ट्रांसप्लांट की वेटिंग लिस्ट में दर्ज हुआ और परिवार मुनासिब डोनर दिल का इंतजार करने लगा।
6 अक्टूबर को टीम को मुलुंड के फोर्टिस हॉस्पिटल में एक डोनर दिल की खबर मिली। यह दिल 22 साल के एक ब्रेन-डेड युवक का था, जिसके परिवार ने अंगदान की मंजूरी दी थी।
डॉ. पांडा ने कहा, "हार्ट ट्रांसप्लांट में बारीक तालमेल चाहिए, क्योंकि निकालने के बाद दिल को सीमित समय में ही लगाना होता है। डोनर के शरीर से निकलने के बाद उसे संभालकर तुरंत पहुंचाना पड़ता है, देर होने से उसके काम पर असर पड़ सकता है। दिल हमारे पास 25 मिनट में पहुंच गया।"
जब डोनर दिल निकाला और ले जाया जा रहा था, तब रिसीवर टीम ने तन्मय को ऑपरेशन के लिए तैयार कर लिया। डॉ. पांडा ने आगे कहा, "डोनर और रिसीवर की टीमों ने मिलकर काम किया। डोनर का दिल रुकने से लेकर तन्मय के शरीर में ट्रांसप्लांट किए गए दिल के धड़कने तक कुल करीब तीन घंटे लगे। उसकी हालत काफी बिगड़ चुकी थी और वक्त पर इलाज न मिलता तो कई अंगों के फेल होने का खतरा था। इस कामयाबी से साफ है कि अंग का वक्त पर मिलना, तालमेल से उसका पहुंचना और बच्चों के हार्ट का खास इलाज कितना जरूरी है।"
ऑपरेशन के बाद तन्मय को सात दिन ICU में रखा गया। अब उसे वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है। अंग को शरीर के रिजेक्ट करने का खतरा घटाने के लिए उसे जिंदगी भर इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं लेनी होंगी। नियमित चेकअप कराना होगा और इन्फेक्शन से बचाव रखना होगा, जरूरत पड़ने पर अलग भी रहना होगा।
तन्मय के पिता अशोक शिंदे BEST बस में कंडक्टर हैं और मां सुजाता गृहिणी हैं। परिवार की आमदनी सीमित है, इसलिए कुछ बचत, अलग-अलग ट्रस्टों की मदद, कुछ जमीन बेचकर और क्राउडफंडिंग से ट्रांसप्लांट का खर्च जुटाया गया। कुल खर्च करीब 20 लाख रुपये रहा। माता-पिता ने कहा, "हमारा बेटा नवी मुंबई के एक कॉलेज में 12वीं में पढ़ रहा था, जब डायलेटेड कार्डियोमायोपैथी का पता चला। हमारे परिवार के लिए यह बहुत बड़ा झटका था।"
कल अस्पताल में तन्मय के साथ मौजूद मां सुजाता ने कहा, "बेटे को ठीक देखकर बहुत खुशी है। जब बीमारी का पता चला और ट्रांसप्लांट की बात आई तो मन में कितने सवाल थे, कौन सा दिल होगा, शरीर उसे अपनाएगा या नहीं। हम बहुत डरे हुए थे। मैं अस्पताल और डॉक्टरों की टीम की बहुत शुक्रगुजार हूं। मेरा बेटा हमेशा से थोड़ा कम बोलने वाला है, अपने साथ और अपने खयालों में वक्त बिताना उसे पसंद है। हम, यानी उसके माता-पिता और 11 साल का छोटा भाई प्रणव, उसके घर लौटने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।"
बच्चों में अंगदान की जरूरत पर जोर देते हुए डॉ. पांडा ने कहा, "बड़ों के लिए हार्ट ट्रांसप्लांट स्थापित इलाज है, लेकिन बच्चों में यह बहुत कम होता है। सबसे बड़ी मुश्किल मुनासिब डोनर दिल की कमी है। गंभीर हार्ट फेल्योर वाले बच्चे वेटिंग लिस्ट में टिके रह सकते हैं, क्योंकि उनके साइज और मेडिकल जरूरत से मेल खाता दिल ढूंढना मुश्किल होता है। हर उपयुक्त दान एक बच्चे और उसके परिवार को ऐसा भविष्य दे सकता है जो वरना छिन जाता।"
अस्पताल की चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO) डॉ. मिनी बोधनवाला ने कहा, "डोनर अंग के आवंटन और ट्रांसपोर्ट से लेकर ट्रांसप्लांट के बाद की देखभाल तक, हर चरण में महारत और बेहतरीन तालमेल दिखा। हमें उम्मीद है कि इससे बच्चों के अंगदान को लेकर जागरूकता बढ़ेगी और और परिवार दान के बारे में सोचने को आगे आएंगे।"
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