जोगेश्वरी के नेत्रहीन आश्रम में बीस साल से गड़बड़ी, तीन कार्यक्रम अब भी बंद
दिव्यांग कोर्ट के आदेश को करीब एक महीना हो गया, पर जोगेश्वरी के एम.एन. बनाजी इंडस्ट्रियल होम फॉर द ब्लाइंड में 37 लाभार्थियों के मुताबिक जमीन पर कुछ नहीं बदला।
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जोगेश्वरी के मांचेरजी नवरोजी बनाजी (एम.एन. बनाजी) इंडस्ट्रियल होम फॉर द ब्लाइंड को तीन अहम कार्यक्रम फिर से शुरू करने का आदेश दिव्यांग कोर्ट ने दिया था। इस बात को करीब एक महीना हो चुका है। लेकिन संस्था के 37 लाभार्थियों का आरोप है कि जमीन पर कुछ नहीं बदला। जो सेवाएं उनके पुनर्वास और आत्मनिर्भरता के लिए थीं, वे उन्हें अब भी नहीं मिल रहीं।
शिकायतकर्ता और 37 लाभार्थियों में से एक विकास गोटे ने सवाल उठाया कि कोर्ट ने एक अधिकारी नियुक्त किया है और उसे एक साल का वक्त दिया गया है। यह अधिकारी प्रशासनिक मामले सुलझाएगा और जांच करेगा कि संस्था करीब दो दशक से ठीक से क्यों नहीं चल रही। गोटे के मुताबिक जांच के दौरान भी अधिकारी वे तीन कार्यक्रम शुरू कर सकते हैं, जिनके लिए यह संस्था बनी थी। उन्होंने कहा, "हम अपने हक के लिए पहले ही बहुत इंतजार कर चुके हैं। जब जांच और संस्था की बहाली साथ-साथ चल सकती है, तो हम एक साल और क्यों रुकें?"
एक और शिकायतकर्ता विशाल लोहार 2024 में संस्था के वर्किंग हॉस्टल में रहते थे। उन्होंने पूछा कि जब इन्फ्रास्ट्रक्चर मौजूद है और सरकारी फंड भी है, तो कार्यक्रम बंद क्यों हैं। उनके शब्दों में, "इन्फ्रास्ट्रक्चर है, और 2022 में मंजूर होकर मिला 19 लाख रुपये का सरकारी अनुदान भी है। फिर आज भी हमें अपना इंतजाम खुद करने पर क्यों मजबूर किया जा रहा है?"
वर्किंग हॉस्टल के लाभार्थी संजय होनमाने, लोहार और मिलिंद डांगे 2024 में इस सुविधा में रहे थे। ये तीनों चाहते हैं कि तीनों कार्यक्रम फौरन फिर से शुरू हों। उनके साथ वकील डॉ. उदय वारुंजीकर और संस्था के पूर्व लाभार्थी पंकज चौधरी खड़े हैं। चौधरी 2010 में विवाद शुरू होने के बाद से दृष्टिबाधित रहने वालों का साथ दे रहे हैं।
विवाद की कहानी कुछ यूं है। होम फॉर द ब्लाइंड 1956 में बना था। 2010 में पुराने ट्रस्टी परिसर खाली कराने के लिए लीव एंड लाइसेंस कोर्ट और बॉम्बे हाई कोर्ट पहुंचे, और तभी से झगड़ा शुरू हुआ। 2012 में कोर्ट ने ट्रस्टियों से कहा कि वे अंदर रहने वालों के साथ मिलकर उनकी शिकायतें सुलझाएं। 2015 में मूल ट्रस्टियों ने इस्तीफा दे दिया। 2016 में हाई कोर्ट ने संस्था का प्रबंधन एनएबी, वर्ली को सौंपा और कार्यक्रम फिर चालू करने को कहा।
लाभार्थियों का दावा है कि 2022 में सरकार ने 19 लाख रुपये का अनुदान मंजूर किया और जारी भी किया। उनका आरोप है कि 9 फरवरी 2024 को वर्किंग हॉस्टल से 23 दृष्टिबाधित प्रशिक्षुओं को निकाल दिया गया और हर एक को 40,800 रुपये दिए गए। उनके दावे के मुताबिक 1 अप्रैल 2025 को संस्था का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट खत्म हो गया। जुलाई 2026 में दिव्यांग सचिवालय ने ट्रस्टियों से अपना स्पष्टीकरण जमा करने को कहा।
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