गणपती को 21 दूर्वा चढ़ाने की परंपरा के पीछे की धार्मिक कहानी
गणेश पूजा में मोदक और लाल फूलों के साथ दूर्वा का भी खास महत्व है। जानिए क्यों गणपति बप्पा को दूर्वा इतनी प्रिय है और 21 की संख्या का क्या मतलब है।
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गणेश पूजा में मोदक और लाल फूलों के साथ दूर्वा का भी बहुत खास स्थान है। मान्यता है कि गणपति बप्पा को दूर्वा बेहद पसंद है, इसी वजह से पूजा के वक्त बप्पा को 21 दूर्वा की जुड़ी चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। मगर बहुत लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि आखिर गणपति को दूर्वा ही क्यों चढ़ाई जाती है, और 21 की संख्या का क्या मतलब है। इसके पीछे एक पौराणिक कहानी और धार्मिक प्रतीकात्मकता दोनों जुड़ी हुई है।
पौराणिक कथा के मुताबिक, एक बार अनलासुर नाम के असुर की वजह से चारों तरफ हाहाकार मच गया था। उसकी गर्मी से देवता, ऋषि और आम लोग सब परेशान हो गए थे। तब गणपति बप्पा ने अनलासुर को हराकर उसे निगल लिया। लेकिन इससे गणपति के शरीर में इतनी जबरदस्त गर्मी पैदा हो गई कि कई उपाय करने के बावजूद वो कम नहीं हो रही थी। उस वक्त कुछ ऋषियों ने गणपति को दूर्वा चढ़ाई, और दूर्वा खाने के बाद ही गणपति के शरीर की गर्मी शांत हुई। यही कहानी है जिसकी वजह से माना जाता है कि दूर्वा गणपति को बहुत प्रिय है।
अब बात करते हैं 21 की संख्या की। हिंदू धार्मिक परंपरा में 21 का अंक शुभ और पवित्र माना जाता है, और गणेश पूजा में इस संख्या को खास जगह दी गई है। धार्मिक मान्यता के अनुसार शरीर की अलग-अलग शक्तियों और तत्वों के प्रतीक के तौर पर 21 दूर्वा चढ़ाई जाती है। दूर्वा को भक्ति, शुद्धता, संयम और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी माना जाता है।
दूर्वा एक ऐसी हरी घास है जो आसानी से मिल जाती है, तेजी से बढ़ती है और कटने के बाद फिर से उग आती है। इसी वजह से इसे चैतन्य, समृद्धि, लंबी उम्र और सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। गणपति को दूर्वा चढ़ाते वक्त भक्त यही प्रार्थना करते हैं कि उनकी जिंदगी से नेगेटिविटी दूर हो और सुख-समृद्धि मिले।
पूजा के लिए साफ और ताजी दूर्वा लेनी चाहिए। आमतौर पर तीन या पांच पत्तों की दूर्वा की जुड़ी बनाकर बप्पा के चरणों में या सिर पर चढ़ाई जाती है। बहुत जगहों पर 21 जुड़ी या 21 दूर्वा चढ़ाने का रिवाज है। पूजा के वक्त श्रद्धा से गणपति का नाम लेते हुए दूर्वा चढ़ानी चाहिए। पूजा का तरीका और दूर्वा की संख्या हर परिवार की परंपरा के हिसाब से अलग-अलग हो सकती है।
दूर्वा चाहे कितनी भी बार काटी जाए या कुचली जाए, वो फिर से उग आती है। इसी वजह से इसे मुश्किलों को पार करके फिर से खड़े होने का प्रतीक माना जाता है। गणपति को दूर्वा चढ़ाते वक्त भक्त को भी यही सीख लेनी चाहिए कि जिंदगी की परेशानियों का सामना धैर्य से करना चाहिए, ऐसी धार्मिक भावना जुड़ी हुई है।