गुरूवार, 17 सितमबर 2026

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02:48 IST

अमेरिका में OPT पर एक लाख डॉलर फीस का प्रस्ताव, भारतीय स्टूडेंट्स की टेंशन बढ़ी

अमेरिका में पढ़ने वाले भारतीय और दूसरे विदेशी स्टूडेंट्स के लिए एक नई टेंशन वाली खबर आई है। डोनाल्ड ट्रम्प प्रशासन की तरफ से ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग यानी OPT के लिए एक लाख डॉलर की फीस, यानी करीब छियानबे लाख रुपये, का प्रस्ताव रखा गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रस्ताव को व्हाइट हाउस की रिव्यू प्रोसेस में मंजूरी मिल गई है और जल्दी ही इसे नियम के तौर पर लागू किया जा सकता है। लेकिन अभी यह साफ नहीं है कि यह फीस आखिर कौन भरेगा।

OPT उन इंटरनैशनल स्टूडेंट्स के लिए बहुत जरूरी रास्ता है जो अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने फील्ड में असली काम का अनुभव लेना चाहते हैं। इसके तहत योग्य स्टूडेंट कुछ समय के लिए काम कर सकते हैं। आम तौर पर स्टूडेंट्स को बारह महीने का OPT पीरियड मिलता है, जबकि STEM यानी साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और मैथ्स के स्टूडेंट्स को चौबीस महीने की एक्स्ट्रा मुदत मिलती है। इस तरह STEM ग्रैजुएट स्टूडेंट्स को कुल तीन साल तक अमेरिका में काम करने का मौका मिल जाता है।

OPT को अमेरिका की एजुकेशन सिस्टम और नौकरी वाले वीजा सिस्टम के बीच एक बड़ी कड़ी माना जाता है। इंटरनैशनल स्टूडेंट्स OPT के दौरान अमेरिकन कंपनियों में काम करके एक्सपीरियंस लेते हैं, और इसी दौरान एंप्लॉयर आगे चलकर उनके लिए H-1B जैसे वर्क वीजा की प्रोसेस शुरू कर सकता है। इसीलिए जो विदेशी स्टूडेंट्स अमेरिका में पढ़ाई पूरी करके करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए OPT बहुत मैटर करता है।

पिछले साल के आंकड़ों के हिसाब से करीब तीन लाख विदेशी स्टूडेंट्स के पास OPT के जरिए अमेरिका में काम करने की परमिशन थी, जिनमें हायर एजुकेशन पूरी करने वाले स्टूडेंट्स की तादाद ज्यादा है। इसलिए इतनी बड़ी फीस का असर सिर्फ स्टूडेंट्स पर नहीं, बल्कि वहां की यूनिवर्सिटीज और अमेरिकन कंपनियों पर भी पड़ सकता है।

इस प्रस्ताव में सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक लाख डॉलर भरने की जिम्मेदारी किसकी होगी। अभी तक पब्लिक नियमों में इस रकम और पेमेंट के बारे में साफ जिक्र नहीं है, यानी यह तय नहीं है कि यह फीस स्टूडेंट, यूनिवर्सिटी या कंपनी, कौन भरेगा। कानूनी जानकारों और पॉलिसी एक्सपर्ट्स का कहना है कि विदेशी ग्रैजुएट को नौकरी देने वाली कंपनी पर यह आर्थिक भार डाला जा सकता है।

पॉलिसी एनालिस्ट सैम पीक के मुताबिक अगर यह फीस यूनिवर्सिटीज को भरनी पड़ी, तो किसी बाहरी या अनजान कंपनी से जुड़े स्टूडेंट की फीस उठाना यूनिवर्सिटीज के लिए प्रैक्टिकल तौर पर नामुमकिन हो जाएगा। असली तस्वीर तो फाइनल नियम आने के बाद ही साफ होगी।

भारतीय स्टूडेंट्स के लिए OPT अमेरिका में नौकरी शुरू करने का सबसे मुख्य जरिया है। इसी के थ्रू स्टूडेंट अमेरिकन कंपनियों में काम करते हैं और आगे H-1B वीजा स्पॉन्सरशिप की उम्मीद रखते हैं। अगर एक लाख डॉलर का यह खर्चा डायरेक्ट या इनडायरेक्ट तरीके से स्टूडेंट्स पर आ गया, तो अमेरिका में पढ़ाई के बाद वहां काम करना ज्यादातर स्टूडेंट्स के लिए बहुत महंगा साबित होगा।

इंडियन अमेरिकन एडवोकेसी काउंसिल के को-फाउंडर सिद्धार्थ के मुताबिक अगर यूनिवर्सिटीज पर यह खर्चा आया, तो वे इंटरनैशनल स्टूडेंट्स के एडमिशन कम करने पर भी विचार कर सकती हैं, और इसका सबसे ज्यादा असर STEM कोर्सेज पर पड़ने की गुंजाइश है।

अगर यह नियम लागू होता है और इसका आर्थिक भार स्टूडेंट्स, यूनिवर्सिटीज या कंपनियों में से किसी पर भी पड़ता है, तो अमेरिका में पढ़ने जाने वाले स्टूडेंट्स के फैसले पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है। सरकार जब फाइनल नियम, शर्तें और पेमेंट की जिम्मेदारी साफ करेगी, तभी इसका पूरा असर समझ में आएगा।

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