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21:37 IST

1965 की जंग में हार के बाद पाकिस्तान में फैलाई गईं फरिश्तों और चमत्कारों की झूठी कहानियां

लाहौर-सियालकोट पर भारतीय फौज की चढ़ाई के बाद पाकिस्तान में घबराहट छिपाने के लिए गढ़ी गई अफवाहों का किस्सा

1965 की जंग में हार के बाद पाकिस्तान में फैलाई गईं फरिश्तों और चमत्कारों की झूठी कहानियां तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

6 सितंबर 1965 की सुबह भारत-पाकिस्तान जंग के इतिहास में एक बड़ा मोड़ लेकर आई थी। इसी दिन भारतीय फौज के जवानों ने इंटरनेशनल बॉर्डर पार करके सीधे पाकिस्तान के लाहौर और सियालकोट शहरों की तरफ कूच किया था। इस हमले का मकसद इन शहरों पर हमेशा के लिए कब्जा करना नहीं था, बल्कि जम्मू-कश्मीर के मोर्चे पर दबाव बना रही पाकिस्तानी फौज को पीछे हटने पर मजबूर करना था। भारत की इस अचानक और तेज कार्रवाई से पाकिस्तानी फौज पूरी तरह हिल गई, और वहां असली जंग की जगह झूठी कहानियों और अफवाहों का बाजार गर्म हो गया।

जब भारतीय तोपों और टैंकों की गड़गड़ाहट लाहौर और सियालकोट की सरहद तक सुनाई देने लगी, तो पूरे पाकिस्तान में डर फैल गया। जब यह साफ हो गया कि बचाव का कोई ठोस रास्ता नहीं बचा है, तो पाकिस्तानी हुक्मरानों और वहां के धर्मगुरुओं ने आम लोगों का टूटा हुआ हौसला बढ़ाने के लिए धार्मिक चमत्कारों की कहानियां गढ़नी शुरू कर दीं। ये कहानियां सिर्फ लोगों का मनोरंजन करने के लिए नहीं थीं, बल्कि पाकिस्तानी फौज की करारी हार को छिपाने के लिए फैलाया गया एक बड़ा मिलिट्री प्रोपेगंडा था।

लाहौर में जब भारतीय फौज आगे बढ़ी, तो सड़कों पर अचानक एक अफवाह फैल गई। "चुप शाह" नाम के एक मौन धर्मगुरु अचानक सड़क पर आए और जोर-जोर से ऐलान करने लगे कि "अल्लाह चमत्कार करेगा और जीत हमारी ही होगी"। बाद में जब भारतीय फौज ने अपनी रणनीति पूरी होने पर लाहौर का इलाका खाली किया, क्योंकि लाहौर पर कब्जा रखना भारत का सियासी मकसद था ही नहीं, तो पाकिस्तान ने इसे "अल्लाह का करिश्मा" बताकर अपनी झूठी जीत का दावा ठोक दिया। इसी दौर में सियालकोट सेक्टर में भारतीय फौज की जबरदस्त गोलाबारी चल रही थी। जब भारतीय फौज को रोकना नामुमकिन हो गया, तो सियालकोट में यह अफवाह उड़ाई गई कि शहर में सफेद कपड़े पहने और चमकती तलवारें लिए सैकड़ों घुड़सवार घूम रहे हैं। दावा किया गया कि ये घुड़सवार इंसान नहीं, बल्कि गैब से आए "अल्लाह के फरिश्ते" हैं और सीधे जिहाद के लिए मैदान-ए-जंग की तरफ जा रहे हैं।

इन झूठी और मनगढ़ंत कहानियों को पाकिस्तान के लोकल उर्दू अखबारों ने खुलकर हवा दी। एक उर्दू अखबार में छपे खत के मुताबिक, सऊदी अरब के मदीना शहर में दो लोगों को एक ही रात में सपना आया, जिसमें पैगंबर घोड़े पर सवार होकर निकलते दिखे। जब उनसे पूछा गया कि वे कहां जा रहे हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि "पाकिस्तान में जिहाद के लिए जा रहा हूं" - यह बात उसी अखबार में छापी गई थी। इससे भी आगे बढ़कर, जंग में पकड़े गए भारतीय सैनिकों के हवाले से बेहद हास्यास्पद दावे भी छापे गए। दावा किया गया कि सियालकोट और खेमकरण सेक्टर में पकड़े गए भारतीय सैनिकों ने कहा कि मैदान-ए-जंग में लाल और सफेद कपड़ों में घुड़सवारों को देखकर वे हैरान रह गए, क्योंकि उनकी तलवारों से अजीब सी रोशनी निकल रही थी। ऐसी कहानियां छापकर पाकिस्तानी जनता को गुमराह करने और अपनी फौज की हार छिपाने की पूरी कोशिश की गई।

पाकिस्तानी प्रोपेगंडा यहीं नहीं रुका। मुल्तान शहर में भारतीय वायुसेना ने जब बमबारी की, तो दावा किया गया कि वहां मौजूद तीन बुजुर्गों ने भारतीय विमानों से गिर रहे जिंदा बम हाथों से पकड़कर दूर फेंक दिए। पेशावर के एक एयरबेस पर गिरा भारतीय बम पेट्रोल टैंक पर गिरने के बावजूद नहीं फटा, इसे भी एक करिश्मे का रूप दे दिया गया। इन सब में सबसे ज्यादा मशहूर और झूठी कहानी गढ़ी गई भारत के जवान पायलट, जो आगे चलकर एयर मार्शल बने, के.सी. करियप्पा के बारे में। 1965 की जंग में करियप्पा का विमान गिराया गया और पाकिस्तान ने उन्हें युद्धबंदी (POW) बना लिया था। इस घटना के इर्द-गिर्द पाकिस्तान ने यह कहानी गढ़ी कि करियप्पा रावी नदी पर बने इकलौते पुल को उड़ाने आए थे, लेकिन जब वे पुल के ऊपर से उड़े, तो उन्हें एक की जगह 6 अलग-अलग पुल नजर आए, जिससे वे उलझ गए और उनका विमान गिरा दिया गया।

ये सारी ख्वाबों जैसी कहानियां, अफवाहें और मनगढ़ंत दावे असली मैदान-ए-जंग में पाकिस्तानी फौज की कोई मदद नहीं कर सके। जंगबंदी का ऐलान होने तक भारतीय फौज ने लाहौर और सियालकोट के बिल्कुल करीब अपने मजबूत ठिकाने बना लिए थे। भारत ने इस जंग के दौरान पाकिस्तान का काफी बड़ा इलाका अपने कब्जे में ले लिया था और पाकिस्तान को भारी नुकसान पहुंचाया था। आज के दौर की एक बड़ी ऐतिहासिक विडंबना यह है कि 1965 की जंग में भारतीय फौज ने लाहौर के बाहर जिन गांवों पर कब्जा किया था, वे गांव आज लाहौर महानगर का हिस्सा बन चुके हैं। खास बात यह है कि जहां भारतीय फौज ने 1965 में कूच किया था, आज उसी जगह पर पाकिस्तानी फौज की "डिफेंस हाउसिंग अथॉरिटी" (DHA) अपने अफसरों के लिए शानदार प्लॉट डेवलप कर रही है। 1965 की हार छिपाने के लिए रची गई अफवाहों की यह पूरी कहानी आज भी पाकिस्तान के फौजी इतिहास का एक हास्यास्पद सबक मानी जाती है।

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