पुणे में फर्ग्यूसन के छात्र और पशु अधिकार संगठन उतरे सड़क पर, पशु परीक्षण के मसौदा नियम वापस लेने की मांग
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फर्ग्यूसन कॉलेज के छात्रों और पशु अधिकार संगठनों ने पुणे में मार्च निकालकर प्रयोगशाला पशुओं से जुड़े मसौदा नियम 2026 को मौजूदा रूप में वापस लेने की मांग की।
पुणे में गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026 को फर्ग्यूसन कॉलेज के छात्रों ने पशु अधिकार संगठनों सिम्बा एनिमल सेव और पीडस पीपल के साथ मिलकर मार्च निकाला और हस्ताक्षर अभियान चलाया। उनकी मांग है कि Draft Prevention of Cruelty to Animals (Control and Supervision of Experiment, Breeding and Trading of Laboratory Animals) Rules, 2026 को उसके मौजूदा रूप में वापस लिया जाए।
मार्च फर्ग्यूसन कॉलेज के मुख्य गेट से शुरू हुआ और कलाकार कट्टा तक गया। इसमें शामिल लोगों ने प्रयोगों में इस्तेमाल होने वाले जानवरों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। उन्होंने एक QR कोड भी साझा किया, जिससे एक ऑनलाइन पिटीशन खुलती है। यह पिटीशन मसौदा नियमों को वापस लेने की मांग करती है।
अभियान चलाने वालों की एक बड़ी आपत्ति यह है कि Institutional Animal Ethics Committee (IAEC) हल्के या मध्यम दर्जे के प्रयोगों को मंजूरी दे सकती है और उसे केंद्रीय कमेटी, यानी Committee for the Control and Supervision of Experiments on Animals (CCSEA), के पास भेजना जरूरी नहीं होगा। उनका सवाल है कि ऐसी कौन सी स्वतंत्र व्यवस्था होगी जो गंभीर तकलीफ वाले प्रयोगों को इन श्रेणियों में डालकर केंद्रीय जांच से बचने से रोकेगी।
फर्ग्यूसन कॉलेज के फैशन विभाग में दूसरे साल की छात्रा मिहिका ने कहा कि पशु परीक्षण के विकल्प मौजूद हैं। उन्होंने ऑर्गन-ऑन-ए-चिप सिस्टम, 3D सेल कल्चर, मानव ऊतक मॉडल और AI पर आधारित इन-सिलिको मॉडलिंग का नाम लिया।
मिहिका के शब्दों में, "पशु परीक्षण की जगह ऑर्गन-ऑन-ए-चिप सिस्टम, 3D सेल कल्चर, ह्यूमन टिश्यू मॉडल और AI पर आधारित इन-सिलिको मॉडलिंग जैसे विकल्प इस्तेमाल हो सकते हैं। एक बड़ी खामी यह है कि यह प्रयोग इंसानों के लिए भी नुकसानदेह हो सकता है; इसके अलावा यह प्रक्रिया क्रूर भी है और इसमें जानवरों की जान जोखिम में पड़ने का खतरा ज्यादा है।"
पीडस पीपल की पूजा अग्रवाल ने प्रयोगों को मंजूरी देने के प्रस्तावित पैमाने और दर्द के स्तर के वर्गीकरण पर चिंता जताई। उन्होंने कहा, "इस मसौदे में प्रयोगों को मंजूरी देने के नए पैमाने हैं, जो दर्द के स्तर पर टिके हैं और इन्हें तीन बड़ी श्रेणियों में बांटा गया है: हल्का, मध्यम और गंभीर। इन श्रेणियों की सिफारिशें और आंकड़े प्रयोगशालाएं केंद्रीय कमेटी को देंगी। इससे असल प्रक्रिया की जवाबदेही और पारदर्शिता पर नजर रखना और मुश्किल हो जाता है।"
अभियान चलाने वालों ने आवारा जानवरों और मौजूदा कानूनों के तहत संरक्षित वन्यजीवों से जुड़े प्रावधानों पर भी चिंता जताई है। उन्होंने स्वतंत्र निगरानी को और मजबूत करने की मांग की है। साथ ही वैज्ञानिक तौर पर परखे हुए विकल्पों में ज्यादा निवेश करने की भी बात कही है।
आयोजकों ने सरकार से अपील की है कि मसौदा नियमों को मौजूदा रूप में वापस लिया जाए और ऐसे शोध तरीकों को प्राथमिकता दी जाए जिनमें जानवरों को तकलीफ न हो।
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