शिवसेना (UBT) बोली, जनता का आंदोलन लोकतांत्रिक हक है, भागवत के बयान पर उठाए सवाल
शिवसेना (UBT) ने सामना के संपादकीय में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के आंदोलनों पर दिए बयान की आलोचना की।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने गुरुवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत के जनआंदोलनों पर दिए बयान की आलोचना की। पार्टी का कहना है कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक हक है, इसे अराजकता नहीं कहा जा सकता।
पार्टी के मुखपत्र सामना में छपे संपादकीय में उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाले गुट ने आरोप लगाया कि RSS का नेतृत्व जनता की शिकायतों को अनदेखा कर रहा है। संपादकीय के मुताबिक संघ परोक्ष रूप से ऐसी सरकार का साथ दे रहा है, जिसने देश के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।
भागवत ने मंगलवार को नागपुर में RSS के सालाना विजयादशमी कार्यक्रम में कहा था कि लोकतंत्र में आंदोलन होना तय है, लेकिन उनका मकसद समस्याओं को सुलझाना होना चाहिए, समाज में दरार बढ़ाना नहीं। उन्होंने यह भी कहा था कि सरकारें बदलने से बुनियादी मसले जरूरी नहीं कि हल हो जाएं।
संपादकीय ने इन बातों पर सवाल उठाया। उसका कहना है कि सरकार के खिलाफ जनता के गुस्से को राजनीतिक साजिश या अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कहकर टाला नहीं जा सकता।
ठाकरे गुट ने भागवत की सत्ता परिवर्तन वाली बात का मतलब यह निकाला कि इससे 2014 के उस बदलाव पर सवाल उठते हैं, जिससे मोदी सत्ता में आए। संपादकीय ने यह भी पूछा कि क्या RSS को अपने बड़े संगठनात्मक नेटवर्क की उन पुराने राजनीतिक आंदोलनों में भूमिका पर पछतावा है, जिनमें 1977 में सरकार बदलने से पहले चला अभियान भी शामिल है।
संपादकीय में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार पर पिछले 12 साल में आर्थिक और संस्थागत चुनौतियां बढ़ाने का आरोप लगाया गया। इसमें महंगाई, बेरोजगारी, युवाओं की परेशानी, उद्योगपतियों को तरजीह और देश की दौलत का कुछ रसूखदार उद्योगपतियों के हाथ में सिमटना गिनाया गया।
इसके अलावा लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायपालिका, चुनाव आयोग और संसद को लेकर चिंता जताई गई। राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे, परीक्षा के पेपर लीक के आरोप, छात्रों के आंदोलन और किसानों की बदहाली का भी जिक्र हुआ।
शिवसेना (UBT) ने पूछा कि अगर आम जनता आजादी की लड़ाई में शामिल न होती, तो क्या भारत को आजादी या गणतंत्र का दर्जा मिलता। संपादकीय में सवाल किया गया, "क्या राम मंदिर का आंदोलन या RSS की प्रेरणा से हुआ अन्ना हजारे का आंदोलन अराजकता माना गया? क्या संघ को उस कथित तबाही वाली सत्ता को लाने के लिए देश से माफी मांगनी चाहिए?"
पार्टी की दलील है कि आंदोलनों को उनकी मांगों और तरीकों से परखा जाना चाहिए। सिर्फ इसलिए उन्हें खारिज नहीं किया जा सकता कि वे सरकार को चुनौती देते हैं।
अपनी बात खत्म करते हुए संपादकीय ने कहा कि जनआंदोलन सत्ता के इस्तेमाल पर अंकुश का काम करते हैं और नागरिकों को अपनी शिकायतें रखने का जरिया देते हैं। ठाकरे की पार्टी ने भागवत और RSS नेतृत्व से अपील की कि वे ऐसी राजनीति का समर्थन न करें, जिसे वह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरा बताती है। उसने कहा कि सरकारी नीतियों और कथित नाकामियों के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन लोकतांत्रिक सिद्धांतों में जड़ें रखते हैं और जनता के प्रति जवाबदेही का अहम हिस्सा बने हुए हैं।
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