मंगलवार, 3 नवंबर 2026

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रेरा के 10 साल पूरे होने को हैं, FPCE ने प्रधानमंत्री मोदी से कानून बदलने की मांग की

रेरा के 10 साल पूरे होने को हैं, FPCE ने प्रधानमंत्री मोदी से कानून बदलने की मांग की तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 राजनीति डेस्क

फोरम फॉर पीपल्स कलेक्टिव एफर्ट्स का कहना है कि घर खरीदारों को बचाने का रेरा का मकसद ज्यादातर अधूरा है। फोरम ने नया कानून बनाने की मांग रखी है।

रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016, यानी RERA, को लागू हुए 10 साल पूरे होने वाले हैं। इसी मौके पर फोरम फॉर पीपल्स कलेक्टिव एफर्ट्स (FPCE) ने कानून में बड़े बदलाव की मांग की है। फोरम का आरोप है कि घर खरीदारों की हिफाजत का इस कानून का मुख्य मकसद काफी हद तक पूरा नहीं हो पाया है।

FPCE के अध्यक्ष अभय उपाध्याय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ज्ञापन भेजा है। उनके मुताबिक नियामक स्तर की कई नाकामियों और संस्थाओं की कमजोरियों की वजह से यह कानून असरदार नहीं रह गया। फोरम ने केंद्र से कहा है कि RERA को बदलकर एक अलग "रियल एस्टेट होमबायर प्रोटेक्शन एक्ट" बनाया जाए, जिसमें बिल्डरों की जवाबदेही और शिकायतों के निपटारे पर ज्यादा जोर हो।

FPCE ने माना कि RERA की वजह से कई रियल एस्टेट प्रोजेक्ट एक औपचारिक रजिस्ट्रेशन व्यवस्था में आ गए। लेकिन फोरम का कहना है कि सिर्फ रजिस्ट्रेशन से उन परिवारों को राहत नहीं मिलती, जिनकी जमा-पूंजी अटके हुए प्रोजेक्ट में फंसी है।

फोरम ने 192 पन्नों की एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसका नाम है RERA Extension Abuse: How Regulatory Failure Is Betraying India's Homebuyers। इसमें FPCE ने अंदाजा लगाया है कि सात राज्यों में देरी से चल रहे हाउसिंग प्रोजेक्ट में 12.44 लाख करोड़ रुपये फंसे हैं और करीब 27.6 लाख परिवार इससे प्रभावित हैं। रिपोर्ट में हरियाणा, कर्नाटक, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और तेलंगाना के सरकारी आंकड़ों को परखा गया। फोरम के मुताबिक यह रकम देश की सालाना GDP का लगभग 3.8 फीसदी है।

FPCE का आरोप है कि RERA आने के बाद भी कई दिक्कतें बनी हुई हैं। इनमें प्रोजेक्ट के पैसे का दूसरी जगह इस्तेमाल, निर्माण से जुड़े भुगतान के शेड्यूल का उल्लंघन, प्रोजेक्ट की डेडलाइन मनमाने ढंग से बढ़ाना और जरूरी ऑक्युपेंसी सर्टिफिकेट के बिना कब्जा दे देना शामिल है। फोरम ने यह भी बताया कि उसने रिपोर्ट आवास और शहरी कार्य मंत्रालय को सौंपी थी, पर उसे औपचारिक रसीद नहीं मिली।

ज्ञापन में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों का भी हवाला दिया गया है। FPCE के मुताबिक सितंबर 2024 में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने कथित तौर पर कहा था कि RERA की बेंच "पूर्व नौकरशाहों के पुनर्वास केंद्र" बन गई हैं, जिन्होंने कानून की पूरी योजना को ही विफल कर दिया है। फोरम ने 12 फरवरी 2026 को State of Himachal Pradesh v. Naresh Sharma मामले में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणियों का भी जिक्र किया। FPCE के अनुसार अदालत ने घर खरीदारों को असरदार राहत न दे पाने पर इस संस्था की आलोचना की और इसके मौजूदा रूप में उपयोगी होने पर सवाल उठाया।

फोरम के मुताबिक उसकी आलोचना के केंद्र में कानून के भीतर का एक ढांचागत टकराव है। उसका कहना है कि RERA अथॉरिटी से रियल एस्टेट सेक्टर को बढ़ावा देने और उसे रेगुलेट करने, दोनों की उम्मीद की जाती है, और इससे जिम्मेदारियां आपस में टकराती हैं। फोरम ने यह भी कहा कि स्थानीय बिल्डिंग मंजूरी, स्टैंप ड्यूटी और कंप्लीशन सर्टिफिकेट पर RERA अथॉरिटी का सीधा नियंत्रण नहीं है। ये काम मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण (MMRDA), NOIDA और चेन्नई मेट्रोपॉलिटन डेवलपमेंट अथॉरिटी (CMDA) जैसी राज्य स्तर की एजेंसियों के पास हैं। FPCE का आरोप है कि इस व्यवस्था से अथॉरिटी को काफी छूट मिल जाती है, जबकि घर खरीदार रिफंड, मुआवजे और आदेशों पर अमल के लिए भटकते रहते हैं। फोरम ने कोविड-19 महामारी और 2026 के वेस्ट एशिया संकट के दौरान डेवलपरों को दी गई एक्सटेंशन की तुलना राहत मांग रहे खरीदारों की देरी से भी की।

FPCE ने चार मुख्य मांगें रखी हैं। पहली, प्रमोशन और रेगुलेशन को अलग किया जाए और रियल एस्टेट को बढ़ावा देने का काम विकास मंत्रालयों और शहरी एजेंसियों को दिया जाए। दूसरी, RERA का नाम बदलकर उसे नए सिरे से "रियल एस्टेट होमबायर प्रोटेक्शन एक्ट" के रूप में लागू किया जाए। तीसरी, कानून का प्रशासन आवास से जुड़ी संस्थाओं से हटाकर उपभोक्ता संरक्षण के ढांचे में, जैसे उपभोक्ता मामलों के विभाग में, ले जाया जाए। चौथी, जो अथॉरिटी और चेयरपर्सन आदेश लागू नहीं करते, रूटीन तौर पर प्रोजेक्ट एक्सटेंशन देते हैं या डेवलपरों की बार-बार की चूक को अनदेखा करते हैं, उन पर सख्त जुर्माने का प्रावधान हो।

FPCE ने कहा कि रियल एस्टेट सेक्टर की लंबे समय की तरक्की के लिए घर खरीदारों का भरोसा लौटाना जरूरी है। फोरम के मुताबिक नियामक सुधारों में उपभोक्ता संरक्षण और जवाबदेही को सबसे ऊपर रखना होगा।

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