कश्मीर में एक पैर गंवाने वाले लेफ्टिनेंट कर्नल गोयल अब नकली पैर से स्कीइंग करते हैं
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
मुंबई के लेफ्टिनेंट कर्नल धर्मदत्त गोयल LoC पर IED धमाके में पैर खोने के बाद भी नहीं रुके। अब वे पुणे के सोल्जरेथॉन के एंबेसेडर हैं।
मुंबई के लेफ्टिनेंट कर्नल धर्मदत्त गोयल की कहानी हिम्मत की मिसाल है। लोग उन्हें डी डी गोयल भी कहते हैं। कश्मीर में एक धमाके में उनका पैर चला गया, लेकिन उन्होंने जिंदगी अपनी शर्तों पर जीना नहीं छोड़ा। आज वे नकली पैर के साथ स्कीइंग करने वाले पहले भारतीय के तौर पर वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हैं।
फौज में आने से पहले गोयल जुहू के SNDT में प्रोफेसर थे। उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि उनकी जिंदगी में फौज भी आएगी। वे बताते हैं कि एक दोस्त ने कहा था कि एक वैकेंसी है जो उनके लिए ठीक रहेगी। उन्हें फौज में जाने का मन नहीं था, फिर भी वे साथ चले गए, ताकि कैंट एरिया को अंदर से देख सकें। देखते ही देखते उन्होंने इंटरव्यू निकाला, SSB पास किया और सिख रेजिमेंट का हिस्सा बन गए। तब उनकी उम्र 26 साल थी और पोस्टिंग कश्मीर में मिली।
नौकरी के करीब पांच महीने बाद गोयल अपनी टुकड़ी के साथ करीब 13,000 फीट की ऊंचाई पर लाइन ऑफ कंट्रोल (LoC) के पास गए। टुकड़ी का काम घुसपैठियों का पता लगाना और आर्मी बेस बनाने के लिए जगह तय करना था। गोयल के मुताबिक उन्हें कुछ टॉफी के रैपर दिखे और उन्हें घुसपैठ का पक्का यकीन हो गया, मगर लोकेशन के सही कोऑर्डिनेट्स नहीं मिल पा रहे थे। इसलिए उन्होंने अकेले आगे जाने का फैसला किया। LoC के करीब 400 मीटर आगे उन्हें राख से भरा एक गड्ढा दिखा। जांचने के लिए वे पास गए और तभी जोरदार धमाका हुआ। वे कहते हैं कि सब कुछ एक सेकंड के अंदर हो गया। उन्होंने पीछे मुड़कर अपने जवानों से पोजीशन लेने को कहा, पर सब सन्न खड़े थे। गोयल का पैर IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) पर पड़ा था और उसी में उन्होंने अपना पैर खो दिया।
मौसम खराब था, इसलिए उन्हें निकालने में 23 घंटे लग गए। पैर कट जाने के बावजूद गोयल ने फौज छोड़ने का फैसला नहीं किया। वे ट्रेनर और इंस्ट्रक्टर के तौर पर 20 साल तक काम करते रहे।
साल 2022 में किसी मिशन के सिलसिले में उन्हें दोबारा कश्मीर बुलाया गया। वे उसी बेस कैंप गए और उन्हें लगा कि जिंदगी का एक चक्र पूरा हो गया। उनके शब्दों में, तभी उन्हें समझ आया कि उस दिन उनके साथ क्या हुआ होगा और उनके साथियों ने उन्हें कैसे बचाया। उसी साल लेफ्टिनेंट कर्नल धर्मदत्त गोयल फौज से रिटायर हुए।
ठीक होने के दौरान उनके सामने कई अड़चनें आईं, पर गोयल अपनी मर्जी से जीने पर अड़े रहे। वे कहते हैं कि जवानी में वे बहुत बेफिक्र और जोशीले थे। एक बार तो पढ़ाई छोड़कर ढाबे पर काम करने लगे थे। उनका सवाल था कि जब तब इतनी जिद थी, तो अब अपनी शर्तों पर क्यों नहीं जी सकते। आज वे पैराग्लाइडिंग, स्काईडाइविंग, मैराथन दौड़ और मोटरसाइकिल की सवारी कर चुके हैं, और डांस भी सीख रहे हैं।
50 साल की उम्र में गोयल मोटिवेशनल स्पीकर, लेखक और खिलाड़ी हैं। वे पुणे में 15 नवंबर को होने वाले 'सोल्जरेथॉन' के मौजूदा संस्करण के एंबेसेडर भी हैं, जिसमें आम लोगों को देश की सेवा कर रहे जवानों के साथ दौड़ने के लिए बुलाया जाता है, ताकि वे उन्हें करीब से जान सकें। गोयल का मानना है कि देश का रक्षा बजट बहुत बड़ा है, करीब 13 प्रतिशत, फिर भी ज्यादातर आम लोग फौजी जिंदगी से जुड़ाव महसूस नहीं करते। उन्होंने कहा, 'हम उम्मीद करते हैं कि यह दूरी कम होगी, ताकि लोग सेवाओं और उनमें मिलने वाले मौकों को बेहतर समझ सकें।' उन्होंने यह भी कहा, 'हम फौजियों की कुर्बानियों को याद रखते हैं और चाहते हैं कि शहर के लोगों के साथ चलकर यह भावना उनसे बांटें और सारी दूरियां मिटाएं।'
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