बारहवीं का फॉर्म अटका: महाराष्ट्र के 18,534 छात्रों की UDISE में एंट्री ही नहीं
ग्यारहवीं में ऑफलाइन दाखिले के कारण राज्य के हजारों छात्र बारहवीं की परीक्षा का फॉर्म नहीं भर पा रहे हैं।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
महाराष्ट्र में बारहवीं की परीक्षा का फॉर्म भरने का वक्त आया, तो हजारों छात्रों के पैरों तले जमीन खिसक गई। दो साल तक दिन-रात पढ़ाई की, परीक्षा की पूरी तैयारी भी कर ली, लेकिन अब फॉर्म भरने की बारी आई तो रास्ता बंद मिल रहा है। जानकारी सामने आई है कि ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन न होने की वजह से राज्य के पूरे 18,534 छात्रों का शैक्षणिक भविष्य अंधेरे में पड़ गया है।
मामले की जड़ ग्यारहवीं के दाखिले में है। इन छात्रों को ग्यारहवीं में ऑनलाइन की जगह ऑफलाइन एडमिशन दिया गया था। इस वजह से उनकी एंट्री UDISE सिस्टम में हुई ही नहीं। अब इसी तकनीकी गलती के कारण उन्हें बारहवीं का परीक्षा फॉर्म भरने से रोका जा रहा है।
सामने आया है कि राज्य के 8 विभागों के 1,218 जूनियर कॉलेजों ने ये गैरकानूनी ऑफलाइन दाखिले दिए। अकेले छत्रपती संभाजीनगर विभाग के कॉलेजों के 1,718 छात्र इस गड़बड़ी में फंसे हैं। UDISE+ केंद्र सरकार का सिस्टम है, जिसमें स्कूली शिक्षा की पूरी डिजिटल जानकारी जमा होती है। मगर प्रशासन की लापरवाही से यह मसला सीधे छात्रों के भविष्य पर आ बैठा है।
विभागवार आंकड़े इस तरह हैं। अमरावती विभाग में 124 कॉलेज और 1,137 छात्र हैं। छत्रपती संभाजीनगर विभाग में 175 कॉलेज और 1,718 छात्र हैं। कोल्हापुर विभाग में 170 कॉलेज और 1,611 छात्र हैं। लातूर विभाग में 83 कॉलेज और 846 छात्र हैं।
सबसे ज्यादा मार मुंबई विभाग पर पड़ी है, जहां 193 कॉलेजों के 6,478 छात्र प्रभावित हैं। नागपुर विभाग में 178 कॉलेज और 1,945 छात्र हैं। नाशिक विभाग में 118 कॉलेज और 2,206 छात्र हैं। पुणे विभाग में 177 कॉलेज और 2,593 छात्र हैं। कुल मिलाकर महाराष्ट्र में 1,218 जूनियर कॉलेज और 18,534 छात्र इसकी चपेट में हैं।
सवाल यह है कि पिछले साल से ग्यारहवीं के सारे दाखिले ऑनलाइन करने के साफ आदेश थे, फिर कॉलेजों ने ऑफलाइन एडमिशन क्यों दिए? क्या दाखिले के वक्त कॉलेजों और शिक्षा विभाग को नियम याद नहीं आए? छात्रों ने दो साल पढ़ाई की, तो अब फॉर्म के वक्त यह कहकर पल्ला झाड़ना कि उनकी एंट्री नहीं है, कहां तक ठीक है?
अगर गलती कॉलेजों की है, तो शिक्षा विभाग आखिर कहां सो रहा था? और अगर चूक सरकारी सिस्टम में प्रशासनिक या तकनीकी स्तर पर हुई है, तो उसकी सजा बेकसूर छात्र क्यों भुगतें? अधिकारियों और संस्था चलाने वालों की इन गलतियों से छात्रों का पूरा एक साल बर्बाद होने का डर पैदा हो गया है। इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा, यह सवाल अब भी बना हुआ है।
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